
आज मोहल्ले में एक व्यक्ति शहद बेचने आया था। उसकी बड़ी-2 काली मूंछे थी। कुर्ता, पायजामा पहने हुए सांवले रंग औसत ऊॅचाई का था। सिर पर तौलिया बांधे हुए था। वह साइकिल के पीछे एक सरसों के तेल का टिन (पीपा) बांधे हुए था। साइकिल में आगे दो झोले टंगे हुए थे। गली में साइकिल लेकर ‘‘शहद ले-लो‘‘ कहते हुए पैदल ही चले जा रहा था। इसी बीच वह श्रेया के घर के पास पहुॅच गया। इससे पहले कि वह शहद वाला श्रेया के घर के सामने पहुॅचता, उससे पहले ही उसे विजय ने रोक लिया। उसने अपने पापा को बुलाया। विजय ने अपने पापा से शहद लेने के लिए आग्रह किया, परंतु उनकी शहद व शहद वाले में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई दी। वह अनमने मन से यह कहते हुए अंदर जाने लगे कि यह गली-गली लोग नकली शहद शकर से बनाकर लूटते घूमते रहते हैं। बेटा यह लेने वाला नहीं है। यह कहकर वह घर के अंदर जाने लगे। विजय अपने पापा की खिन्नता देखकर मायूश लग रहा था। इससे पहले कि विजय के पिता जी श्रेयस घर के अंदर जाते। शहद वाले ने मिन्नत की भाई साहब आप जानकार लगते हैं।