भारतवर्ष की आध्यात्मिक भूमि पर जब-जब अधर्म का अंधकार छाया है, तब-तब ईश्वरीय शक्तियों ने विभिन्न रूपों में अवतार लेकर मानवता का मार्गदर्शन किया है। इन्हीं अवतारों में से एक हैं—भगवान हनुमान। कल चैत्र शुक्ल पूर्णिमा है, जिसे संपूर्ण विश्व में ‘हनुमान जयंती’ (हनुमान जन्मोत्सव) के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। यह दिन केवल एक उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह साहस, भक्ति, सेवा और अनुशासन के उस शिखर को नमन करने का दिन है, जिसका नाम ‘हनुमान’ है।
अतुलनीय स्तुति और उसका भावार्थ
हनुमान जी की उपासना में एक विशेष श्लोक का गान किया जाता है, जो उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को कुछ पंक्तियों में समाहित कर लेता है। लेखक मारकंडेय सिंह के अनुसार, इस मंत्र का जाप मात्र कर लेने से साधक को मानसिक बल प्राप्त होता है:
“मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥”
मंत्र का गहरा अर्थ:
- मनोजवं: जिसकी गति ‘मन’ के समान तीव्र है। संसार में मन से तेज कुछ भी नहीं, और हनुमान जी की संकल्प शक्ति वैसी ही वेगवान है।
- मारुततुल्यवेगं: जिनका वेग वायु (मारुत) के समान अतुलनीय है।
- जितेन्द्रियं: जिन्होंने अपनी सभी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। वे परम ब्रह्मचारी और संयमी हैं।
- बुद्धिमतां वरिष्ठम्: जो केवल बलशाली ही नहीं, बल्कि बुद्धिमानों में भी सबसे श्रेष्ठ और वरिष्ठ हैं।
- वानरयूथमुख्यं: जो वानर सेना के प्रमुख और सेनापति हैं।
- श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये: ऐसे भगवान श्री राम के प्रिय दूत की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
हनुमान जयंती का धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व
हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार माने जाते हैं। उनका जन्म केसरी और माता अंजनी के घर हुआ था। उन्हें ‘चिरंजीवी’ होने का वरदान प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि वे कलयुग में भी पृथ्वी पर सशरीर विद्यमान हैं। जहां कहीं भी भगवान राम का नाम लिया जाता है या रामायण का पाठ होता है, वहां हनुमान जी अदृश्य रूप में उपस्थित रहते हैं।
हनुमान जयंती का पर्व हमें सिखाता है कि ‘शक्ति’ के साथ ‘भक्ति’ का होना अनिवार्य है। बिना भक्ति के शक्ति निरंकुश और अहंकारी हो जाती है, लेकिन हनुमान जी के पास असीमित शक्तियां होने के बाद भी वे स्वयं को केवल प्रभु श्री राम का ‘दास’ ही कहते हैं। उनका यह दास-भाव उनके महान व्यक्तित्व की आधारशिला है।
आज के युग में हनुमान जी की प्रासंगिकता
लेखक मारकंडेय सिंह के अनुसार, आज के तनावपूर्ण और भागदौड़ भरे जीवन में हनुमान जी एक ‘मैनेजमेंट गुरु’ के रूप में उभरते हैं। उनका जीवन हमें कई जीवन-मंत्र देता है:
- संकट प्रबंधन: जिस प्रकार उन्होंने समुद्र पार करते समय सुरसा, सििंहका और लंकिनी जैसी बाधाओं को अपनी बुद्धि और बल से परास्त किया, वह हमें सिखाता है कि लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए।
- संवाद कुशलता: जब वे पहली बार श्री राम से मिले, तो उनके बोलने की शैली से प्रभु प्रभावित हो गए। यह हमें बताता है कि हमारी वाणी में विनम्रता और स्पष्टता होनी चाहिए।
- निस्वार्थ सेवा: उन्होंने कभी भी अपने उपकारों के बदले किसी पद या प्रतिष्ठा की इच्छा नहीं की।
कैसे करें कल पूजन?
कल के दिन भक्तों को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। लाल वस्त्र धारण कर हनुमान जी की प्रतिमा के सम्मुख चमेली के तेल का दीपक जलाना चाहिए। - सिंदूर अर्पण: हनुमान जी को सिंदूर अत्यंत प्रिय है, इसे चढ़ाने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- पाठ: हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या सुंदरकांड का पाठ सामूहिक रूप से करना अत्यंत फलदायी है।
- प्रसाद: बूंदी के लड्डू या बेसन के लड्डू का भोग लगाकर उसे निर्धनों में वितरित करें।
हनुमान जयंती का यह पावन अवसर हमें आत्म-निरीक्षण का संदेश देता है। हमें केवल हनुमान जी की पूजा ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके गुणों—जैसे अटूट विश्वास, अदम्य साहस और पवित्रता—को अपने आचरण में उतारने का प्रयास करना चाहिए। जब हम अपने भीतर के ‘अहंकार’ को त्यागकर समाज की सेवा में लगते हैं, तभी सही अर्थों में हनुमान जयंती सफल होती है।
अंत में, मारकंडेय सिंह सभी पाठकों को हनुमान जन्मोत्सव की हार्दिक मंगलकामनाएं देते हैं। बजरंगबली आप सभी के जीवन से कष्टों का हरण करें और आपको बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करें।
जय श्री राम! जय हनुमान!
लेखक: मारकंडेय सिंह
